पिछले तीन माह से बालाघाट मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल गांव में तीस से अधिक बच्चों की मृत्यु हो चुकी है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी इन बच्चों की दुखद मौतों का सवाल उठा चुके हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 5 सितंबर को शेयर की अपनी पोस्ट में लिखा था, ‘मध्य प्रदेश के बालाघाट में 30 आदिवासी बच्चों की मृत्यु की खबर बेहद चिंताजनक और पीड़ादायक है। इस घातक बीमारी के साथ पीने के पानी, पोषण और समय पर इलाज जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव बच्चों की जान ले रहा है।’
इसे सरकार की पूर्ण विफलता बताते हुए उन्होंने सीएम से इसका समाधान करने की मांग की थी। उन्होंने लिखा था, ‘ये सरकार की पूर्ण विफलता है। मुख्यमंत्री स्वयं इसका समाधान करें और क्षेत्र में तत्काल जांच, इलाज और राहत उपलब्ध कराएं। बच्चों की जिंदगी से समझौता नहीं हो सकता।’ इसके साथ ही गांधी ने एक अखबार की खबर की कतरन भी पोस्ट की थी जिसमें बालाघाट क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौत का उल्लेख करते हुए स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठाये गए थे।
मुख्यमंत्री भी यहां पहुंचे थे और मृतक परिवारों को दो दो लाख मुआवजा देने की घोषणा के साथ जांच का आश्वासन दिया था। उधर, इसी मुद्दे को लेकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की गई है, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। याचिका में कहा गया है कि बच्चों को पर्याप्त उपचार नहीं मिल रहा है और 50 बिस्तरों की क्षमता वाले अस्पताल में करीब 400 बच्चों का इलाज किया जा रहा है।
इतना सब होने के बाद जब वहां काक्रोच पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके पहुंचे तो वहां बाहर से आए कथित पत्रकार उनकी गाड़ी घेर लेते हैं। एक महिला पत्रकार दिपके से कहती है, “देखो ये आ गए लाशों पर राजनीति करने, अब फुरसत मिली आपको सुध लेने की। कितना समय हो चुका है। अब आप आए हैं अपनी संवेदनाएं जताने के लिए।” दूसरे पत्रकार भी लगभग इसे ही दोहराते हैं।
अभिजीत कई बार देर के लिए माफ़ी मांगते हैं किंतु फिर बेअसर पत्रकारों को छोड़कर वे चल देते हैं। यहां सवाल यह है कि पत्रकार उनके आने के पहले ही एकत्रित थे। कहा जा रहा है कि वे बाहर से आए थे। पत्रकारों को ये हक किसने दिया कि वे देरी से पहुंचने वाले किसी पार्टी नेता को लाश पर राजनीति का आरोप लगाकर भागने विवश करें। यह रहस्यपूर्ण है की किसने उन्हें भेजा था।
कतिपय लोग इसके सम्बंध प्रदेश की भाजपा सरकार से जोड़कर देख रहे है जो उचित नहीं लगता है। किंतु यह भी सच है कि अभिजीत दिपके इससे पहले राजस्थान में भी, जो भाजपा शासित राज्य है, स्कूल जांच के मामले में नागरिकों से घिर चुके हैं। वहां से भी उन्हें खदेड़ा जा चुका है। यदि यह सब भाजपा की किसी साजि़श के तहत हो रहा है तो कष्टप्रद है।
कॉकरोच पार्टी के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने भी इसी तरह का आरोप लगाया है और कहा, ‘केवल भाजपा के लोग ही ऐसे पैसे देकर बुलाए गए हंगामा करने वालोंका बचाव पत्रकारों के तौर पर कर सकते हैं।’ इससे पिछली रात को दिपके ने सोशल मीडिया पर अपने बालाघाट पहुंचने की जानकारी दी थी। ऐसा समझा जा रहा है इसी सूचना पर वे एकत्रित हुए थे। स्थानीय पत्रकार और नागरिक भी इन इंफ्लूएंसर्स के व्यवहार की निंदा कर रहे हैं। ये जांच ज़रुरी है कि किसने अभिजीत के खिलाफ इन्हें भिजवाया था।
(तस्वीर : वीडियो ग्रैब)
(सुसंस्कृति परिहार एक्टिविस्ट, टिप्पणीकार हैं।)